रविवार, 5 अगस्त 2012

साँस की कीमत

माँ ने रोज 
की तरह सूर्यास्त से
पहले ही खाना खा लिया था 

सुबह के लिए
स्नान घर में पानी की बाल्टी
अपने पहने के कपड़े रख लिए थे 

कबूतरों को सवेरे
दाना डालने वाला कटोरा भी
भर कर कमरे मे रख लिया था 

गीता और माला भी 
हमेशा की तरह
 सिरहाने रखना नहीं भूली थी

प्रातः बेला में
जब उठी तो कहने लगी
थोड़ा जी घबरा रहा है 

हम कुछ समझ पाते
इतने में ही मृत्यु ने
बाज की तरह
 झपटा मारा और
 ले उड़ी माँ की साँसों को  

एक क्षण पहले तक 
 माँ जीवित थी
अब वो शव बन चुकी थी 

नहीं जगा पाया
माँ को मेरा विलाप
बहुओं और बेटों का आर्तनाद 

वो हमारी
 आवाजो की दुनियाँ से 
  बहुत दूर'जा चुकी थी 

आज पहली बार मैंने 
साँस की कीमत को
पहचाना था। 




कोलकत्ता
२४ सितम्बर, २०११







हरा पत्ता






जब पीला पत्ता
डाल से गिरता है
हरा पत्ता थोड़ा
कांप उठता है 

लेकिन
थोड़ी देर बाद  
शान्त हो जाता है 

बसंत आते ही
हरा पत्ता फिर
लहलहाता है

वो नहीं जानता
मरने के बाद
आत्माओं के सफ़र
के बारे में। 


कोलकता 
२ सितम्बर, २०११

मेरी माँ

माँ
जिसके उच्चारण मात्र
से ही मुँह भर जाता है 

जिससे माँगने के लिए कभी
शब्दों  की जरुरत नहीं पड़ती है 

जो हरपल घर का पूरा
ख्याल रखती है 

वो माँ अचानक हम सब को
छोड़ कर चली गयी

माँ  के जाने के अलावा
कँही कुछ नहीं बदला 
केवल माँ का कमरा खाली है 

आज भी जब जब
माँ की स्मृति आती है
दुःख जी में नहीं समाता है 

मै बचपन में जब
शहर में पढने जाता
माँ अश्रुपूर्ण नेत्रों  से दूर तलक
पहुंचाने जाती 

छुट्टियों में जब
वापिस आता माँ की
आँखों में ख़ुशी के अश्रु
टपक पड़ते 

कलकते में
जब तक रात को
घर नहीं पहुँच जाता
माँ खिड़की के पास खड़ी
राह देखती रहती

चाहे जितनी रात हो जाती
माँ की आँखे राह से
नहीं हटती 

माँ के अचानक चले जाने का
वह अकल्पित दृश्य
बार- बार मेरी आँखों के
सामने घूमता है

मैं भी क्या करूँ
मन का भी अजब हाल है
रोना नहीं चाहता फिर भी
आँखों से अश्रु टपक पड़ते हैं। 


कोलकत्ता
२६ जुलाई, २०११

माँ और नारी



माँ
आँखों में क्षमा
मन में वात्सल्य
हाथ देने हेतु उठा हुवा

नारी
आँखों में आलोचना
मन में कामना
हाथ लेने हेतु फैला हुआ 

माँ
समर्पित-सात्विक जीवन
अल्पसंतोषी
इश्वर की सीधी-सादी रचना 

नारी
समर्पण की चाहत
संतुष्टी का अभाव
इश्वर की जटिल रचना  

माँ
असमर्थ, पराजित, दुर्बल
पुत्र को भी बढ़ कर
आँचल में समेटती है 

नारी
असमर्थ,पराजित
 दुर्बल पुरूष को
अपनी बाँहों में पनाह नहीं देती है। 


कोलकत्ता
१५ नवम्बर, २००९

आदमी







मैंने तुम्हें 
अंधे व्यक्ति की लाठी पकड़ कर
 रास्ता पार कराते हुए देखा है 

मैंने तुम्हें  
सड़क पर घायल पड़े व्यक्ति को
  अस्पताल पहुंचाते हुए देखा है  

मैंने तुम्हें  
वृद्धाश्रम में जन्मदिन मनाकर
  खुशियाँ बाँटते हुए देखा है 

मैंने तुम्हें 
वृद्ध और असहाय व्यक्तियों की
 सहायता करते हुए देखा है

मैंने तुम्हें 
गरीब की आँख से गिरते
आँसू को उठाते हुए देखा है

मै तुम्हारा
एक स्टेच्यु बना कर
  मेडम तुसाड के म्यूजियम में
 लगाना चाहता हूँ 

ताकि आने वाली पीढ़ी 
एक सच्चे इन्शान को
देख सके। 

कोलकत्ता
१८ सितम्बर, २०११  

जीवन अमृत

इश्वर सबका मालिक है                  
              इसी भाव से जीना है  
हरिमय जीवन सबका हो               
             ऐसा मनमे रखना है 

आपस में सब  भाई- भाई               
           ऐसे मिल कर रहना है  
ओणम,क्रिसमस, ईद,दिवाली          
           सबके साथ मनाना है 

मानवता हो धर्म सभी का           
             शील -विनय से रहना है  
भेद- भाव से ऊपर उठकर             
              सब को गले लगाना है 

राग द्वेष का तिमिर हटा कर         
            प्रेम की ज्योति जलाना है  
मिले धूप हर आँगन को              
            अब  ऐसा सूरज  लाना है 

भूले राही का हाथ पकड़ कर        
              मंजिल तक पहुँचाना है
सभी सुखी और स्वस्थ रहें           
                     ऐसा संसार बनाना है। 




कोलकाता
११ नवम्बर, २०११

अच्छा लगता है



अच्छा लगता है
सुबह की गर्म चाय के साथ
 अखबार का पढ़ना 

अच्छा लगता है
गुनगुनाती धूप में बैठ कर
 सर्दी को भगाना  

अच्छा लगता है
घर के आँगन में हरसिंगार के
 फूलों का महकाना 

अच्छा लगता है
घर आये मेहमान को
बांहों में भरना 

अच्छा लगता है
प्रातः काल में दोस्तों के साथ
 विक्टोरिया मे घूमना 

अच्छा लगता है
शर्मा की दूकान पर कचोड़ी 
के साथ गर्मागर्म जलेबी का खाना 

अच्छा लगता है
जो मन मे आये वो लिखना
और सहेज कर रख लेना



कोलकत्ता
१२  अगस्त, २०११